उत्तराखंड के लोकगीत

उत्तराखंड के लोकगीत



लोकगीत

कुमाऊँ–गढ़वाल के लोकगीतों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, किंतु इसका मूल स्वरूप आज पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं रह पाया है। वर्तमान में यहाँ विभिन्न प्रकार के लोकगीत प्रचलित हैं—संस्कार गीत, नृत्य गीत, झोड़ा, चांचरी, छपेली, थड़्या, चौफला, छोपती, प्रणय गीत, ऋतुगीत, बसन्त गीत, श्रुतियाँ, खुदेड़, होली, बारहमासा, देवी-देवताओं से संबंधित गीत, वीर गीत, कृषि गीत, बाल गीत एवं सामयिक गीत आदि।

लोकगीत लोक साहित्य की सबसे प्राचीन विधा है। मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहने के कारण इनमें समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। कुछ गीत समय के साथ लुप्त हो जाते हैं, जबकि कुछ लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

लोकगीतों का ऐतिहासिक महत्व

लोकगीतों के आधार पर विभिन्न युगों का इतिहास जाना जा सकता है। धार्मिक गीतों में प्राचीन युग की झलक मिलती है, वीर गीतों में वीरगाथा काल का प्रभाव दिखाई देता है तथा श्रृंगार गीतों में मध्यकालीन जीवन का चित्रण मिलता है। अंग्रेजी शासन काल के गीतों में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और शोषण का वर्णन मिलता है।

संस्कार गीत

भारतीय परंपरा में सोलह संस्कारों का उल्लेख है, परंतु वर्तमान में मुख्यतः जन्म, विवाह और मृत्यु से संबंधित संस्कार ही प्रमुख हैं। कुमाऊँ-गढ़वाल में मृत्यु संस्कार को छोड़कर अन्य सभी संस्कारों में स्त्रियों द्वारा गीत गाने की परंपरा है। संस्कार गीतों में परिवर्तन की संभावना बहुत कम होती है।

मंगलकामना के गीत

शुभ कार्यों के प्रारंभ में मंगलकामना के गीत गाए जाते हैं, जिनमें देवताओं का आह्वान कर कार्य की सफलता की प्रार्थना की जाती है।

कुमाऊँनी गीत

शकुना दे शकुना दे
काज ए अति नीको।
शुभ रंगीलो, दहिनी, बाजनी, शंख शब्द, देणी तील, भरियो कलश,
पाटलो, अंचली कमल को फूल,
सोही फूल मोलावंत गणेश, रामचन्द्र लछीमन, भरत शत्रु, लव कुश
जीवा जनम आधा अमर होई।
सोही पाटु पड़ी रैना सिद्धि-बुद्धि,
सीता देवी, उरमिणी, दोलागिणी आदिवंती पुत्रवंती होई।

कुमाऊँनी गीत

देना होया देना होया धोल रे पितर
देना होया देना होया पंच रे देवता
देना होया देना होया भूमि का भुइयाला
देना होया देना होया खोली का गणेश
देना होया देना होया पवाळे बारुड़ी।

गढ़वाली गीत

बोला बोला, सगुन बोला
जो जस धान, धरम देवता
जो जस धान, धरती माता
जो जस धान, खोली का गणेश
तुम्हारी धातिमा यो कारज होरे
यो कारज सफल फल्यान।

न्यौते (निमंत्रण) के गीत

इन गीतों में देवताओं, प्रकृति तथा समाज के विभिन्न वर्गों को शुभ कार्यों में आमंत्रित किया जाता है।

कुमाऊँनी गीत

आज बधाई न्यूतिए
प्रात जो न्यूतूँ मैं सूरज, किरणन को अधिकार
समाग बधाई न्यूतिए
साँझ जो न्यूतूँ मैं चन्द्रमा, तारा को अधिकार
समाग बधाई न्यूतिए
गणपति न्यूतूँ मैं काज सौं, बरमा-विष्णु न्यूतूँ मैं काज सौं।
गणपति सिद्धि कराय, बरमा-विष्णु सिरीष रचाय
समाग बधाई न्यूतिए।
ब्राह्मण न्यूतूँ मैं काज सौं, बढ़ैया न्यूतूँ मैं काज सौं
ब्राह्मण वेद पढ़ाय, बढ़ैया चौक ले आय
समाग बधाई न्यूतिए।
अहिरिन न्यूतूँ मैं काज सौं, गुजरिन न्यूतूँ मैं काज सौं।
अहिरिन दूध ले आय, गुजरिन दधि ले आय
समाग बधाई न्यूतिए।

गढ़वाली गीत

पैले न्यूतो पैले न्यूतो वेद मुखी ब्रह्मा
आज चौंंद ब्रह्माजी को काज
तब न्यूतो औजी को बेटा
आज चौंंद बढ़े को काज
आज न्यूतीयालिन मैन मंगल्याणी नारी
आज चौंंद मंगल को काज
आज न्यूतीयालिन हल्द्युन की बाड़ी
आज चौंंद हल्दी को काज।

जन्म संबंधी गीत

जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में खुशी, आशीर्वाद और धार्मिक भावनाओं का समावेश होता है।

गढ़वाली गीत
पैले धरती उपजे फिर उपजे आकाश
तब उपजे पौन-पाणी
महादेव घर बेटा उपजे, सूर्य घर अपने कर्ण राजा
नंदू का घर नारायण जन्मे
बालक जन्मे देवताओं का जाया।

गढ़वाली गीत
तु होलो मेरा तपस्या को जायो
तेरी जिया बैण ख्यार केन कर्म
तु बनलो बाला कुल की जोत।

कुमाऊँनी गीत
पितरों ले सपन देखायो आहो कुलदीपक
ए जाग दियड़ा, तेरा सोहे रामचन्द्र
भली करी सीता देवी, रानी बहुरानी
बहुओ ले भरी है रसाई आहो कुलदीपक।

नामकरण संस्कार के गीत

नामकरण के अवसर पर बधाई और मंगलकामना के गीत गाए जाते हैं।

कुमाऊँनी गीत
रामचन्द्र दरबार लक्ष्मण दरबार बधाइयो रतो ए
तुम तो ठगवन हो बहुवा सीता देवी बहुरानी
हम तो ओढ़ि रहे अपने पिया परसाद
ससुर दरबार लला को काज।

गढ़वाली गीत
बोला बोला सगुन बोला
गणपति आँगणी औ बढ़ई बाजे
सिद्धि-बुद्धि देवी का घर आनंद छायो।

चूड़ाकर्म (मुंडन) के गीत

इन गीतों में बच्चे के मुंडन के समय नाई से विनती की जाती है कि वह बच्चे को कष्ट न दे।

गढ़वाली गीत
नाई रे नाई तू मेरा भाई, धर्म को भाई
मेरा लाडा पीड़ा न लाई, पीड़ा न लाई।
ले ढोलो नाई में कानो कुंडल, शाल दुशाला
मेरा लाडा पीड़ा न लाई।

कुमाऊँनी गीत
नाजु बेटा नाजु बेटा पीड़ जन करिये
यां रे केशा दूधले धोया, अमृत सींचा
मेरा बालक के पीड़ जन करिये।

उपनयन संस्कार के गीत

इन गीतों में जनेऊ संस्कार और शिक्षा के महत्व का वर्णन मिलता है।

कुमाऊँनी गीत
भलो-भलो पुन्याण बोई छ कपास
भाई बैण्याण मिलि गाड़ी छ कपास
ब्राह्मण का बेटा न बैठ छ जनेऊ।

गढ़वाली गीत
लावा मेरा पिता जी ब्रह्मा देवी लावा
आज छ बेटा को जनेऊ
न्यूती आवा वेदमुखी ब्रह्मा।


विवाह संस्कार के गीत

विवाह उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इसकी प्रत्येक रस्म में अलग-अलग गीत गाए जाते हैं।

कुमाऊँनी गीत
सुवा रे सुवा वनखण्डी सुवा
हरिया तेरो गात
जा सुवा नगरी न्यूति दे आ।

गढ़वाली गीत
पिंजरी का सुवा कटोरी का सुवा
सुन पंछी सुवा
दे सुवा तु सुहागिण्यों न्यूतो।


स्नान (हल्दी) के गीत

विवाह तथा अन्य संस्कारों में स्नान (हल्दी) की रस्म अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में पवित्रता, शुद्धि तथा मंगलकामना का भाव प्रकट होता है।

उबटन दलिये मलिये मैल छुड़ाइए
गंगा जमुना मिलि आई तो बालो नहाइए
कलस भराइए
भाई-बहिनी मिलि आए तो बालो नहाइए।

लोकगीतों का व्यापक स्वरूप

उत्तराखंड के लोकगीतों का स्वरूप अत्यंत व्यापक है। इनमें केवल संस्कारों का ही वर्णन नहीं मिलता, बल्कि समाज के हर पक्ष—धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन—का समावेश होता है। लोकगीतों में लोकजीवन की सरलता, भावनात्मकता तथा प्रकृति के साथ गहरा संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

इन गीतों में पर्वत, नदियाँ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी तथा ऋतुओं का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है। साथ ही, लोकगीतों के माध्यम से लोग अपने सुख-दुःख, प्रेम-विरह, आशा-निराशा और जीवन के अनुभवों को व्यक्त करते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष

उत्तराखंड के लोकगीतों में धार्मिक आस्था की गहरी छाप दिखाई देती है। इनमें विभिन्न देवी-देवताओं—जैसे गणेश, शिव, विष्णु, देवी, स्थानीय देवता तथा पितरों—का आह्वान किया जाता है। प्रत्येक शुभ कार्य की शुरुआत देवताओं के स्मरण से की जाती है।

लोकगीतों में वैदिक परंपरा, पौराणिक कथाएँ तथा स्थानीय मान्यताएँ एक साथ मिलकर एक समृद्ध सांस्कृतिक स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। यह भी स्पष्ट होता है कि यहाँ के लोग प्रकृति और देवताओं के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं।

सामाजिक महत्व

लोकगीत सामाजिक एकता और सामूहिकता के प्रतीक हैं। इन गीतों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्ग—ब्राह्मण, बढ़ई, लोहार, नाई, महिलाएँ तथा अन्य लोग—एक साथ जुड़ते हैं। हर व्यक्ति की अपनी भूमिका होती है और सभी मिलकर किसी भी संस्कार को पूर्ण करते हैं।

विशेष रूप से महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे ही इन लोकगीतों को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित करती आ रही हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार उत्तराखंड के लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि ये यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन के सजीव दस्तावेज़ हैं। इनमें अतीत की झलक, वर्तमान का अनुभव और भविष्य की आशा—तीनों का समन्वय देखने को मिलता है।

लोकगीत हमारी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें सहेजना और आगे बढ़ाना हम सभी का कर्तव्य है।

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